Sunday, 20 March 2011

खुनक होली

गाम घरक विचार व्यवस्था से ता हम इ पूर्वानुमान केने रही जे फगुआ के सांझ तक किछु हिंसक घटना क समाचार भेटबे करत मुदा एही रूप से खून खुनामहीं होयत एकर गुंजाईश हमारा दिमाग से बहार छल. घटना हमारा गाम में आ  संगही गामक आस पास सेहो भेल.

१. घटना दिन के दस बजे क छि झंझारपुर में आपसी भिरंत भेल जाही में लोक सब होली क नाम पर पघरिया निकल्लैन आ कट्टम कट्टा भेल लेकिन जगत जननी क असीम कृपा छलैन जे किनको अपन जान से हाथ नहीं धोबे परलैन.
२. दोसर  घटना लोहना रेलवे स्टेशन क कात अवस्थित बरका गाम क छि जत गामक लोक सब मिल क थाना क बरा  बाबू क धुनी  देलखिन. आ ओहिठाम सर्व्सीमा आ बरका गामक बिच सेहो मारा  पीटी क खबर अछि.
३. तेसर घटना हमर गाम महिनाथपुरक छि जाही में एकटा युवक जिनक नाम रितेश छैन ओ ग़लतफ़हमी क शिकार भेलाह आ चौमथ टोल परहक किछु लोक हुनका अपन शिकार बना लेलखिन. ताहि हल्ला गुल्ला के क्रम में जम्पुरी टोलक लोक सब सेहो भैग क एलाह ओहिठाम पता लागल जे रामकुमार नामाक युवक जनि बुझी क झगड़ा लगौने छलाह. इ बात क पोल खुजितेही बुझु जेना लागल लोक सब झगरा हटाबई क लेल नही बल्कि फूटबाल खेलाइल आयल छलाह जेहि में रामकुमार के फूटबाल क भूमिका निभाब परल.
४. एकरा बाद मेंहथ,कोठिया,भराम,रैयाम आ हैठीबाली में सेहो छिट पुट घटना क खबर एही बेरका फगुआ क शर्मसार केलक.

Wednesday, 16 March 2011

फगुआ आ भांग

जोगीरा सारारारा................................
होली त सब किओ बुझैत छथीन मुदा हम मिथिलांचल क वासी एकरा फगुआ कहैत छि. फगुआ क मिथिला में एकटा अलगे पहचान अछि . सरस्वती पूजा क समय वसंत क पुरबा जखने चलाइय  सब होली के विषय में सोचअ लागैत छि. होली शब्द सुनतही गामक याद अबैय ओ श्याम बाबु क टेक्टर ताहि पर गामक नेना भुटका सब अपन अपन मुंह लाल हरियर पियर केने,  आगू आगू बाबा काका सबहक हुजूम आ नब्गार्हा सब ढोलक झैल लेने सारारारा गबैत बड नीक लागैत अछि. देखल जाऊ गामक याद आयल त भांग नै रहत इ भा नै सकैया कियाकि फगुआ आर भांग में बहुत घनिष्ट सम्बन्ध  अछि. हमारा नै लगैय जे फगुआ में भांग खेबा से कियो परहेज करबाक प्रयास कराइ छैथ. मुदा एही कड़ी में एकटा बड पैघ नशा जुडल जा रहल अछि दारु क. हमरा त इ बुझना जैयअ  जे किछु दिन अगर इ दशा रहल त मिथिला में फगुआ क अस्तित्वा नै रहत. अपनेक सब देखैत हेबई जे लोक दारु पीब क फुच्च भा जै छैथ आ सगरो गाम गोबर जेना लेर्हैल घूरे छथी. ता हमर इ मिथिला से अपील जे फगुआ क फगुआ रहअ दी अभागुआ नै बनाबी. बाकि फगुआ क ढेर ढेर शुभकामना. खूब रंग उडाऊ अबीर खेलु मुदा भाईचारा से दूर नै भटकू.

जोगीरा सारारारा................................

Friday, 11 March 2011

कहर करोड़ों का

 अनियंत्रित लोग, पैसो के लिए भागमभाग के बीच पहली बार थर्रायी जन समुदाय  १ नवम्बर १७५५(1755) को. जिसे हम लोग सुनामी के नाम से जानते हैं. सुनामी के इतिहास के उधेड़बुन में जब मैं  इतिहास के पन्नों को उलटाया तो मेरे रोंगटे खड़े हो गये. मैंने पाया की एक कम्पन और ६०,०००(60,000) मौतें, ये नजारा था यूरोपियन देशो का. दूसरा पन्ना ३६०००(36000) लोगों के खून से खुला, तीसरे पन्ने पर २७०००(27000) लोग अपने प्राणों की बजी दे चुके थे. जैसे जैसे मै पन्ना उलटता गया मेरा हृदय मनो कुछ पल के लिए उन सब के बिच समां  गया और मेरे रोंगटे खड़े हो गये.कितना निर्दयी है हमारा भगवन, हमारा परवरदिगार लगता है की उसे हमारे प्राणों से खेलने में मज़ा आता है और इन प्राणियों  पर कहर बरपा  देता है. यही सब सोचते सोचते मै उस पुस्तक के अंतिम पन्नों तक पहुँच गया जिसके ऊपर नाम था जापान का, तारीख ११-०३-२०११ की और दृश्य जलती रिफैनेरी का, खिलौनें की तरह बहता कार और हवाईजहाज और उसके बिच मौत के सामने नाचता इन्सान वाकई दुखद ........पुस्तक जिसमे करोड़ों लोग जो मौत को गले लगा चुके थे को पढने के बाद  मैं यही सोचता रहा और इश्वर को कोसता रहा की आखिर इस करोड़ों  के कहर से क्या मिला उसे ........... 

विद्यापति गीत

चानन भेल विषम सर रे, भुषन भेल भारी।
सपनहुँ नहि हरि आयल रे, गोकुल गिरधारी।।
एकसरि ठाठि कदम-तर रे, पछ हरेधि मुरारी।
हरि बिनु हृदय दगध भेल रे, झामर भेल सारी।।
जाह जाह तोहें उधब हे, तोहें मधुपुर जाहे।
चन्द्र बदनि नहि जीउति रे, बध लागत काह।।
कवि विद्यापति गाओल रे, सुनु गुनमति नारी।
आजु आओत हरि गोकुल रे, पथ चलु झटकारी।।


गोसौनिक गीत

जय जय भैरवि असुरभयाउनि, पसुपति–भाबिनि माया ।
सहज सुमति वर दिअ हे गोसाञुनि, अनुगति गति तुअ पाया ।।

बासर–रइनि सवासने सोभित, चरन चन्‍द-मनि-चूड़ा ।
कतओक दैत मारि मुहे मेरल, कतन उगिलि करु कूड़ा ।।

सामर बदन, नयन अनुरञ्जित, जलद जोग फुल कोका ।
कट-कट विकट ओठ–पुट पाँड़रि, लिधुर–फेन उठ फोका ।।

घन घन घनन घुघुरु कटि बाजए, हन हन कर तुअ काता ।
विद्यापति कवि तुअ पद सेवक, पुत्र बिसरु जनु माता ।।

जय जय भैरवि असुरभयाउनि, पसुपति–भाबिनि माया ।
सहज सुमति वर दिअ हे गोसाञुनि, अनुगति गति तुअ पाया ।।

मिथिला प्रणाम

मिथिला पुत्र विभूति भूषण झा के तरफ सौ समस्त मिथिलाबसी क   प्रणाम