Friday, 11 March 2011

कहर करोड़ों का

 अनियंत्रित लोग, पैसो के लिए भागमभाग के बीच पहली बार थर्रायी जन समुदाय  १ नवम्बर १७५५(1755) को. जिसे हम लोग सुनामी के नाम से जानते हैं. सुनामी के इतिहास के उधेड़बुन में जब मैं  इतिहास के पन्नों को उलटाया तो मेरे रोंगटे खड़े हो गये. मैंने पाया की एक कम्पन और ६०,०००(60,000) मौतें, ये नजारा था यूरोपियन देशो का. दूसरा पन्ना ३६०००(36000) लोगों के खून से खुला, तीसरे पन्ने पर २७०००(27000) लोग अपने प्राणों की बजी दे चुके थे. जैसे जैसे मै पन्ना उलटता गया मेरा हृदय मनो कुछ पल के लिए उन सब के बिच समां  गया और मेरे रोंगटे खड़े हो गये.कितना निर्दयी है हमारा भगवन, हमारा परवरदिगार लगता है की उसे हमारे प्राणों से खेलने में मज़ा आता है और इन प्राणियों  पर कहर बरपा  देता है. यही सब सोचते सोचते मै उस पुस्तक के अंतिम पन्नों तक पहुँच गया जिसके ऊपर नाम था जापान का, तारीख ११-०३-२०११ की और दृश्य जलती रिफैनेरी का, खिलौनें की तरह बहता कार और हवाईजहाज और उसके बिच मौत के सामने नाचता इन्सान वाकई दुखद ........पुस्तक जिसमे करोड़ों लोग जो मौत को गले लगा चुके थे को पढने के बाद  मैं यही सोचता रहा और इश्वर को कोसता रहा की आखिर इस करोड़ों  के कहर से क्या मिला उसे ........... 

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