भारत युवा देश है और हमारे युवकों को रफ़्तार से खेलने का इतना शौक है कि मौत की रफ़्तार भी थमने का नाम नहीं ले रही । कहा जाता है की भारत में आतंकवादी हमले, नक्सली द्वारा पुलिस को उड़ाने जैसे कामों को अधिक संख्या में अंजाम दिया जा रहा है लोग यहाँ के प्रशासन को हमेशा दुत्कारते है। लेकिन लोगों का दुत्कारना भी ठीक है क्योंकि मेरे आँख के सामने की घटना है चूँकि मैं अभी जमशेदपुर में हूँ तो यहीं की बात कर रहा हूँ । साकची नाम का एक छोटा सा सुन्दर जगह जिसे लोग इस शहर का दिल भी कहते हैं वहाँ बीच सड़क पे तिपहिये लगाकर यात्री चढाने के लिए मौके पर मौजूद ट्राफिक पुलिस को बीस रुपये का चढ़ावा देना पड़ता है, अगर आप गाड़ी चलाते समय फोन पर बात करते पकड़ा गये तो तीस रुपये में बात बनेगी और हेलमेट घर में छूट गया तो उसके लिए चाय नाश्ता नहीं बल्कि उनके भोजन का इंतज़ाम करना होगा जिसकी कीमत पचास से एक सौ के बीच हो सकती है जो काफी हद तक आपके शक्ल सूरत पर भी निर्भर करता है.
आज सड़क से लेकर संसद तक इस बात का चर्चा है की देश के लिए आतंकवाद, नक्सलवाद सबसे बड़ा समस्या है. लेकिन अगर हम एक नज़र सड़क दुर्घटना और नक्सलवाद के तुलनात्मक अध्ययन पर देते है तो परिणाम हमें रोंगटे खड़े करने में कोई कसर नहीं छोड़ता है .परिदृश्य कुछ इस प्रकार है कि जहाँ हमारे देश में नक्सली हमले से मरने वालों की संख्या तीन हजार के इर्द गिर्द घूमता है वहीं सड़क दुर्घटना में लगभग एक लाख अड़तीस हज़ार लोग मौत के मुंह में समा जाते हैं, और लगभग तीस हज़ार ज़ख़्मी होकर काल के गाल में जाने से बच जाते हैं . ज़रा इसके दूसरे पहलु पर नज़र दौड़ाते हैं तो हमें यह भी ज्ञात हो जाता है की इस घटनाओं से मानव संसाधन के साथ साथ उनके बीमा की राशी पर लगभग बीस अरब डॉलर का हमारा आर्थिक नुकसान भी होता है. इन सभी पहलुओं को देखते हुए सबसे बड़ा प्रश्न हमारे सामने आ खड़ा होता है की आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है. शुरुआत अपने घर से, विद्यालय जाने के लिए पापा बच्चों को मोटर साईकिल तो दे देते हैं न तो उनके उमर का ध्यान दिया जाता है न तो सुरक्षा सामान अर्थात हेलमेट का। अगर बात मंत्रालय की करें तो इसके लिए सबसे जरूरी है की यातायात पुलिस की भर्ती के समय उनकी काबिलियत को देख के उनका चयन किया जाए फिर उनको आवश्यकतानुसार प्रशिक्षित किया जाए। बात अगर दूसरे देशों की करें तो हमारे आस पड़ोस वाले(चाइना, लंका, बांग्लादेश) भी हमसे पीछे हैं। जिस प्रकार आतंकवाद हमारे लिए चिंता का विषय है ठीक उसी प्रकार सड़क दुर्घटना भी ऐसा मुद्दा है जिसे नज़र अंदाज़ करना खतरे से खाली नहीं है।



