Monday, 18 April 2011

मैथिलि संगीतक पतन


 मिथिलाक सांस्कृतिक परम्परा संगीतक क्षेत्र में देखल जा सकैत अछि. प्राचीन मिथिलाक शासक संगीतज्ञ लोकनिक के संरक्षण दैत छलाह. एकर अनेको उदाहरण अछि. नान्यदेवक ( ११०७-११३३ ई.)  अवदान कदापि विस्मृत नहीं कैल जा सकैत अछि. लोकप्रिय रागक क्षेत्र में हुनक बड़ पैघ योगदान छलैन. ओ स्वयं १६० रागक प्रतिपादन कैने छलाह. तत्पशात हरिसिंहदेव, सिंह भूपाल, जगधर, जग्ज्योतिर्मल, वंशमणि झा, शुभंकर ठाकुर, घनश्याम मल्लिक, चंदा झा आ अनेकानेक व्यक्तिक नाम एही क्षेत्र में ज्योतित भेल.
          मिथिलाक चारिटा संगीत घराना प्रसिद्ध छल -अमता, मधुबनी, पंचोभ, आ पंचगछिया.ई सब मिली क  १०० वर्ष सँ मिथिला मध्य जन-मन में संगीतक आनंद प्रवाहित क रहल छैथ. 
         
                  मुदा दुखक बात इ जे आइ मिथिला लोक संगीतक धरोहर नष्ट  भ रहल अछि. मैथिलि लोक गीतक स्वर में पतन स्पष्ट परिलक्षित होइत अछि. ओकरा आइ बम्बैया तर्ज पर गाओल जा रहल अछि. भोजपुरी भाषाक गीतक अनुकरण एकरा मुख्य धारा सँ भटका रहल अछि. विभिन्न मैथिलि कैसेट एकर प्रत्यक्ष प्रमाण अछि. गाम-गाम में एखनो दुर्गापूजा, महादेवपूजा जेहन आयोजन होएत अछि. मुदा जतय पहिने शास्त्रीय गायन होएत छल ओतए आब पशिमी पॉप धुन पर आधारित आर्केस्ट्रा के बिना मनोरंजन संभव नहीं बुझाना जाइत अछि. 
    त आऊ हम सब मिलिके मिथिलांचलक संगीतके लुप्त होबा सँ बचाबी.      

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